मोड़

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इक ऐसा मोड़ हैं,
जिसपे हैं तू खड़ा,
चौतरफ़ा मंज़िले,
इकतरफा फैसला|

जहा से शम्स उठे,
वहा चिताएं जले,
जहा पे डूबे काफिर,
वहा अँधेरे पले,
पीछे वो घर है तेरा,
किवाड़ जिसके बंद हैं,
आगे वो डर हैं तेरा,
दहाड़ जिसकी बुलंद हैं,
किस तरफ़ा का तू राही दिल,
किस तरफ़ा तेरी मंज़िल,
डर है और दुनिया हैं,
तू किसका|

इक ऐसा मोड़ हैं,
जिसपे हैं तू खड़ा,
चौतरफ़ा मंज़िले,
इकतरफा फैसला|

चल आगे बढ़ ज़रा,
आँख से आँख मिला के डर की,
डट जा राही डट जा|

चल बढ़ ज़रा,
सांस पे सांस की गांठे बाँध और,
डट जा राही डट जा|

किसी से हारने का डर क्यों,
तू खुद से जीत जा,
फिर हर मोड़ हैं तेरा,
हर मंज़िल तेरी ग़ुलाम,
है शम्स से चमकीला तू,
अंधेरो का अंजाम,
तेरा घर है सारी दुनिया दिल,
और तू हैं सबका||

क्या तेरा फैसला…

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